सोमवार, 4 अप्रैल 2016

क्यों नहीं हो सकी और क्यों संभव नहीं है भारत में वाम क्रांति...



मेहनत, व्यापार, जोखिम व लाभ-हानि..ये चार ऐसे शब्द हैं जिनको जीवन में उतारने वाला किसान व व्यापारी बनता है, उद्यमी बनता है और अंततः सफल हो पूंजी का निर्माण करता है। लेकिन भारतीय वामपंथियों और समाजवादियों को इन चारों (मेहनत, व्यापार, जोखिम व लाभ-हानि) अल्फाज़ों से नफरत हैं। उनको नफरत इसलिए हैं कि वे मैकाले पद्धति के पढ़े-लिखे और वेतनभोगी होना पसंद करते हैं। वे किसान, मजदूर नहीं होना चाहते...वो उनके लिए आवाज़ उठाने वाले बनना चाहते हैं। वो जानते हैं कि किसान या व्यापारी बनने का मतलब है - बरस-दर-बरस सर्वस्व दांव पर लगाना...लेकिन इतना बड़ा जोखिम और साहस करने योग्य होते तो वही न कर रहे होते न?
ये बस अपने भय से आपको डराते हैं, इनका भय भी एकमात्र यह है कि देश-समाज में वह पक्ष हावी न हो जाए जो इन कामचोरों और गैरजिम्मेदार लोगों को काम करने और मेहनत करने पर मजबूर कर दे। जो इनको इनके कंफर्ट ज़ोन से बहार घसीट कर परेशान न कर दे। ये धर्म और दक्षिणपंथ को अफीम और फासिस्ट बता कर उनका भय दिखा कर खुद को स्थापित करते है। ये आज़ादी की मांग करके लोगों को सब्जबाग दिखा कर खुद को स्थापित करते हैं और जब सत्ता में आते हैं तो अपने चारों ओर दीवारें खड़ी कर लेते हैं और लग जाते हैं उस सुंदर समाज के प्रचार में जो दीवार के उस ओर होना बताया जाता तो है, लेकिन वास्तविकता में होता नहीं है। यही कारण है कि पूरी दुनिया का एक भी ऐसा वामपंथी विचारधारा वाला देश न हुआ जो दीवारें गिरने पर अंदर से लुटा पिटा न निकला। वहां पर लोगों को रोटियों के लिए भी लाइन लगाए, भुखमरी और गरीबी से मरता दुनिया ने देखा है।

आखिर वहां पर भी धर्म और दक्षिणपंथ का भय दिखा कर ही सत्ता हासिल की गयी थी....किसके लिए? सर्वहारा के लिए, आज़ादी के लिए (अरे वही कन्हैया टाइप्स) और अंततः क्या हुआ... स्टालिन, चाऊशेस्कू वगैरह पैदा हुए जो और बड़े आदमखोर थे (तो अब तो उदाहरण भी नहीं कि बता सकें कि देखो वो रहा हमारा मॉडल जो सफल है)। इसीलिए ये बस पैदा होने से मरने तक आलूचना बेचते आई मीन आलोचना करते रहते हैं।


ये दरअसल उस कला आलोचक जैसे होते हैं जो आलोचना तो खूब करता है लेकिन जब ब्रश पकड़ा दिया जाता है तो सारी आलोचना फना हो जाती है। ये आलोचनाएं तो खूब करेंगे और जब आप इनसे संशोधित योजना की बात करेंगे तो ये बगले झांकने लगेंगे। इनके पास दरअसल कोई सफल योजना जैसी चीज है ही नहीं। ये तो बस क्रांति के हवा-हवाई महल और समानता के गीत गाते स्वप्नजीवी होते हैं। जिनका हकीकत से बस इतना वास्ता होता है कि धंधा-पानी बरकरार रहे।



दिल्ली व अन्य राजधानियों में बैठे कर क्रांति की दंड-बैठक पेलने वाले अधिकांश वामियों और समाजवादियों की पृष्ठभूमि या तो ग्रामीण होगी या सफल वामी (स्थापित व कमाऊ वामी) परिवार की मिलेगी। अभी हाल में दिल्ली में आज़ादी के लिए स्यापा पीटने वाले लोगों की पारिवारिक पृष्ठभूमि यही है। इनको मुफ्त आवास, भोजन और नशा-पत्ती मिल रहा है तो माँ-बाप के पास जा कर खटने की जरूरत किसे है? 



ब ऐसे लोग अगर किसी देश में समाज में परिवर्तन और क्रांति का बीड़ा उठाएं होंगे तो 90 क्या, 900 क्या, 9000 बरस नहीं होनी क्रांति क्योंकि कारण साफ है। ये चाहते ही नहीं समाज में परिवर्तन ये तो बस अपने आरामतलब, गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार और कामचोरपने वाली जिंदगी को जीते रहना चाहते हैं। 

मजे की बात तो यह है कि ईश्वर को न मानने वाले वामपंथी, प्रकृति में भी यकीन नहीं करते हैं। क्रांति की इनकी प्रिय अवधारणा - स्पॉन्टेनियस है। वह परजीवी क्रांति-बेल जो जिस पेड़ पर चढ़ जाए उसे नष्ट कर दे। JNU इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। जिस विश्वविद्यालय को 'राष्ट्रीय एकता और अखंडता' (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अधिनियम 1966) को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाया गया उसी का नाश करने पर तुले हैं। काश्मीर को स्वतंत्र कराने के लिए सर्वस्व निछावर करने वाले ये लोग दूसरी ओर राष्ट्र की अवधारणा को ही नकारते हैं। 

इतना अधिक कन्फ्यूज है भारतीय वामपंथ, कि तय ही नही कर पाता किस फाइनांसर के साथ खड़े हों। वो कभी कांग्रेस से वित्तपोषित होता दिखता है तो कभी सरहद पार से। भारत में अपनी पैदाइश से लेकर आज तक इस विचारधारा ने जितनी वल्दियत बदली है उतनी बार तो सांप आपने जीवन में केचुंल नहीं उतारता और गिरगिट रंग नहीं बदलता। कहने का तात्पर्य यह है कि इनको सिर्फ और सिर्फ अपने से मतलब है। अपने से अर्थ है - खुद से (विचारधारा समूह से नही)। ये लाभ के लिए आपस में भी कुत्ता-घसीटी कर डालते हैं। जलेस और प्रलेस के झगड़े और उससे भी पहले वामपंथियों का आपसी विभाजन इसके कुछ एक उदाहरण हैं। ये विशुद्ध रूप से अपने तक सीमित लोगों का एक समूह है जो अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए ही एकजुट होता है और किसी के भी साथ खड़ा सकता है, किसी के भी साथ।

पहली आज़ादी तो वे खुद से तय कर निकले हैं, दुखी व गरीब माँ बाप से आजादी, उनकी जिम्मेदारी से आजादी। और ये वो लोग हैं जो समाज में क्रांति की जिम्मेदारी उठाने निकाले हैं। जो स्थापित परिवारों से हैं उनके लिए तो यह पेशा है। फटहा झोला लटका कर खुद के आरामतलब, गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार (सामाजिक संबंधों से इसीलिए भागते हैं, यू नो लिव इन रिलेशन वगैरह) और कामचोरपने को क्रांति के लबादे से ढ़ंक कर रखना। ये दोनो ही वे लोग है जो हसिया या हथौड़ा दोनो ही उठा कर आठ घंटे काम कर लें तो हसिया और हथौड़ा दोनो शर्म से धरती में धंस जाएं।


ये दरअसल भिन्न-भिन्न कालखंडों में हरामखोरी की जीवनशैली के हामी लोगों का एक कुनबा भर है (70 के दशक के हिप्पियों जैसे)। 

सो जिनका लक्ष्य ही क्रांति नहीं है वो क्या करेंगे क्रांति?


रविवार, 6 मार्च 2016

रोहित वेमुला और समाज के हाशिये पर बैठे, पीड़ित और सताए हुए गरीब विद्यार्थियों के लिए मगरमच्छी आँसू बहाने वाले राजनीतिक दलों की असली नीयत का जीता-जागता उदाहरण है, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्षा का प्रवेश

दो बरस पहले आरक्षित सीट पर किसी हरिजन या ओबीसी का हक मारते हुए एडमीशन लेने वाले और दिलाने वाले सवर्ण लोगों को इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अध्यक्षा के एडमीशन पर क्या कहना है? इलाहाबाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्षा ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा है - उनका उत्पीड़न इस लिए हो रहा है क्योंकि उन्होने योगी आदित्यनाथ के कार्यक्रम का पुरजोर विरोध किया था - और कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि दो बरस पहले के इस प्रकरण पर आज कार्रवाई क्यों?

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्षा जी कृपया ये बताएं कि दो बरस पहले आपने किसी हरिजन या ओबीसी का हक मारा तब आपने उनके उत्पीडित होने के बारे में क्यों न सोचा? आज आपको अपने उत्पीड़न की चिंता हो रही है? समाज के हाशिये पर बैठे, पीड़ित और सताए हुए गरीब घरों के उन विद्यार्थियों के साथ हो रही ज्यादती का विरोध तक क्यों नहीं किया? आपको लाभ हो रहा था इसीलिए न?  यही एक कारण हो सकता है। आप जानकार न थी यह कोई वजह नहीं हो सकती, और अगर उस (जानकारी न होने के) कारण को मान भी लें तो आज आप उस गलती को सुधारने का बजाए राष्ट्रपति को पत्र लिख कर आदर्श संघर्ष के किस मानक की स्थापना कर रही हैं? आप विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक ऐसी अध्याक्षा हैं जिसने समाज के हाशिये पर बैठे, पीड़ित और सताए हुए गरीब घरों के विद्यार्थियों का हक मारा है। और तो और हमने सुना है कि हरिजनों और ओबीसी के लिए ज़ार-ज़ार रोने वाले कांग्रेसी और वामपंथी दलों ने आपका चुनाव में समर्थन भी किया था?

और वे लोग जो दो बरस बाद की जाने वाली संभावित जांच पर सवाल उठा रहे हैं तो उनसे मेरा यह पूछना है कि वे किस परम्परा को जन्म दे रहे हैं क्या त्रुटि या अपराध का पता लगने पर उसके सुधार या दंड का प्रावधान करने से पहले यह देखना चाहिए कि वह कितने पहले हुआ था? यानी कि पुरानी घटी घटनाओं और हादसों के लिए उत्तरदायी जीवित लोगों को मात्र इसलिए बक्श दिया जाना चाहिए कि वह घटना पुरानी हो गयी? क्या किसी पीड़ित और सताए हुए गरीब घर के विद्यार्थी के हक मारने वाले और फिर पकड़े जाने पर इधर-उधर के बहाने लगाकर उत्पीड़न का आरोप लगाने वाले को मात्र इसलिए छोड़ दिया जाना चाहिए कि उसका एडमीशन दो बरस पहले हुआ था (भले ही गलत तरीके से हुआ हो)।

मैं मानता हूँ इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्षा का कैरियर भी दांव पर है और वे भी विद्यार्थी भी है लेकिन उनके आरोप-प्रत्यारोप भरे व्यवहार से स्पष्ट है कि उन्होने अपना कैरियर चुन लिया है। सो वे बेहतर स्थिति में हैं कि अपने सही और आदर्श निर्णय से समाज में एक नई राजनीतिक और सामाजिक न्याय से ओतप्रोत पहल का उदाहरण प्रस्तुत करें। यह पहल कैसी होगी, ऐसी होगी या वैसी होगी... इसे देश के युवाओं को इस्तेमाल करने वाली राजनीति तय करेगी या वे स्व-निर्णय लेंगी... आने वाला समय ही बता पाएगा।







शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

भारतीय समाज में व्याप्त भेदभाव

आज के भारतीय समाज में व्याप्त भेदभाव के मसले पर अधिकांश लोकप्रिय दलित चिंतक आपको टकराव की ओर ले जाते दिखेंगे, लेकिन समाज में व्याप्त भेदभाव पर सकारात्मक सुझाव और सुधार की पहल करता कोई न दिखेगा। हमारे आपके दर्शनार्थ इन सभी के आदर्श, बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर या मान्यवर कांशीराम दिखेंगे, लेकिन कोई उनके जीवन संघर्ष को जीने की इच्छा रखता न दिखेगा।
मेरा मानना है कि इसका एक ही कारण है। समाज सुधार एक प्रकार की साधना है जो पूरा समर्पण मांगती है, लेकिन जब इसे व्यवसाय बनाने की लालसा हो तो जो लालसा होगी वही सिद्ध होगी न?
सरल सी बात नहीं समझ आती हम लोगों को कि समाज के किसी तबके को समाप्त करके इस समस्या का हल संभव नहीं है। समाज के हर हिस्से को इसके लिए जागृत होना होगा। इस समस्या से संघर्ष नहीं, समग्र सुधार की भावना से ही निपटा जा सकता है। लेकिन ये दलित चिंतक जानते हैं कि अगर समाज की समझ में यह बात आ गयी तो इनकी रोजी रोटी ही बंद हो जाएगी। इनके इस कुचक्र को समझना होगा और इसे भेदना होगा। हमें समझना होगा कि समाज सुधार में नेतृत्व का काम समाज को तैयार करना होता है, समाज में भेद पैदा करना नहीं। सो उत्तरदायित्व हमारा है। मुझे तो यह समझ आता है कि जिस दिन कर्म के आधार पर समाज में कर्म के महत्व की पुनःस्थापना की शुरुआत होगी, उस दिन से समाज में फैले इस भेदभाव को सुधारने की ओर हम पहला कदम बढ़ा देंगे।
दरअसल यह या किसी भी तरह का भेदभाव एक सड़ांध भरा नाला हैं जो समाज के बीचो-बीच बह रहा है, उसके लिए हर घर जा कर घरों के मुखियाओं को समझाना होगा कि इस नाले में अपने घर के हिस्से की सड़ांध डालना बंद करें और यह एक दो या दस बरस में होने वाला काम नहीं है। घरों तक जाने की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि देश की मूल इकाई घर-परिवार ही हैं। 
जबकि आज के अधिकांश दलित चिंतक तो बस इस नाले से अपने हिस्से की खाद और गैस को बेच कर ऐश कर रहे हैं।
सो सारांश यह है कि हम इस समस्या के समाधान के लिए अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वहन करें तब ही इस समस्या का सामना किया जा सकता है।


शनिवार, 3 जनवरी 2015

"इम्पोर्टेड बाबा"

यारब न वो समझे हैं न समझेंगे तेरी बात,
उनके दिमाग पर कुंडली, बाबा धरे जनाब।
भारत के नाम से, उनको आती रही मिर्गी,

हिन्दोस्तां सेक्युलर है औ इंडिया है फ्रेंडली।
बाबा ने कहा था कि बनाएंगे सबको एक,
गदहे बनेंगे घोड़े और फिर बनेंगे कामरेड।
आएगी मियां जोर से जब क्रांति झमाझम्म,
राजा बनेंगे लुल्ल, और फटीचर चकाचक्क।
ऐसा करेंगे वो कि, वैसा करेंगे वो,
हाथी मारेंगे और चीता फाड़ेंगे वो।
एक्सपेरिमेंट रशिया में तभी फेल हो गया,
विस्फोट होय गया औ कुनबा बिखर गया।
हालत खराब हो गयी औ हाजत हुई खराब,
केवल बचा है कच्छा औ कपड़े सभी खराब।
कुछ बरस चिपके रहे, पंजे का बनके जोंक,
सवाल पूछने का बस अब पाल लिया शौक।
हंसिये हथौड़े से अब तौलते हैं सबका काम,
बाबा अभी भी सिर पे बजते हैं सुबो-शाम।
 ‪#आशुवाणी

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

अटल बनाम मोदी - खुद के आगे बीन बजाता मीडिया!

कल चैनलों पर यायावरी करते हुए एनडीटीवी पर अभिज्ञान जी को देखा, साथ में टंडन जी (अटल जी के मीडिया सलाहकार) को देखकर सुखद आश्चर्य हुआ, सो रुक कर सुनने लगा।

10-15 मिनट में ही अभिज्ञान की लाचारगी पर तरस आने लगा - विषय था - भारत रत्न मिलने पर अटल जी के गुणों का विश्लेषण..अभिज्ञान अपनी पीड़ा को परदे में लेते हुए बिना नाम लिये अटल जी की तुलना मोदी जी से करने लगे कि.."एक अटल जी थे और एक आज के नेता है।" टंडन जी ने लगभग झिड़कते हुए (अटल जी के स्तर से वह झिड़कना ही था) कहा कि - अटल जी की मोदी जी से तुलना करने से पहले एक किस्सा सुन लीजिए..."प्रभाष जोशी जी उस दौरान जनसत्ता के संपादक थे जब अटल जी पीएम थे और जोशी जी एक साप्ताहिक कॉलम लिखते थे - 'स्वयंसेवी प्रधानमंत्री' और मजाल है कि अटल जी उस कॉलम को पढ़ना भूल जाए (ध्यान रहे कि अटल जी और जोशी जी घनिष्ठ मित्र थे)। जोशी जी का पत्रकारिता में क्या कद था यह बताने की जरूरत किसी को नहीं है। अटल जी उनको इसलिए पढ़ते थे क्योंकि वह वादविहीन आलोचना थी, तटस्थ और रचनात्मक थी। आप खुल कर नाम लीजिए कि आप मोदी जी की तुलना अटल जी से कर रहे हैं। ऐसे में जिस शख्स को 40 बरस मीडिया का प्यार मिला हो उसकी तुलना ऐसे शख्स से करना जिसे मीडिया ने 12 बरस तक बायस्ड हो कर किनारे लगाने का प्रयास किया और नतमस्तक हो गया (मीडिया का आज का सुर देख लीजिए)।"

माफ करिएगा लेकिन... क्या प्रभाष जी जैसी पत्रकारिता का पसंगा भर भी करने वाला कोई पत्रकार आज मीडिया में है?

पत्रकारिता में प्रभाष जी के चेले उसी तरह से हो गए हैं जैसे राजनीति में जेपी के चेले। उनमें इस बात की होड़ लगी रहती है कि वे कैसे सिद्ध करें कि वे प्रभाष जी के कितने नज़दीक और प्यारे थे...लेकिन इनमें से कोई भी आत्ममुग्धता और समझौतों से मुक्त नहीं हैं। "मैने जीवन में पेश के लिए कभी किसी तरह समझौता नहीं किया" - जब कोई पत्रकार, संपादक ऐसा बोलता है तो सुनने पढ़ने वाला हर शख्स जानता है कि सामने वाला क्या कहना चाहता है। इन चेलों को लगता है कि प्रभाष जी को लोग जानते नहीं है। उन्होने कभी भी ऐसा दावा नहीं किया, क्योंकि उनको ऐसा करने की जरूरत ही नही थी, उनके कर्म उनकी लेखनी बोलती थी।

ऐसे में मेरे मन में सवाल पैदा हुआ कि अभिज्ञान मोदी जी से अटल जी जैसा बनने की अपेक्षा करते हुए, यह अपेक्षा क्यो करने लगे कि उनको प्रभाष जोशी जी जैसा समझा जाए। क्या तुलना है? है भी या नहीं? पिछले कुछ बरसों में राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति उपजी नकारात्मकता का श्रेय लेने को यह मीडिया तैयार नहीं है लेकिन प्रबल और मजबूत राजनीतिक नेतृत्व के उभार के कारण युवाओं में फिर से राजनीति के प्रति उभरती सकारात्मकता को लेने का श्रेय इस मीडिया को जरूर चाहिए। ऐसे गैरजिम्मेदार मीडिया की स्थिति हमारे देश के बड़े बाबुओं सरीखी है जो अधिकारों की तो बात करता है लेकिन उत्तरदायित्व से भागता है। फिर तुलना कैसी, किसकी और क्यों? सिर्फ कार्यक्रम बनाकर अपना चेहरा चमकाने के लिए। क्या मज़ाक है!

जब आप तुलना करते हैं तो उसका आधार क्या होता है, या बस 30 मिनट के कार्यक्रम को निपटाने बैठ जाते हैं। अंत करते हुए अभिज्ञान कहते हैं कि अटल जी उनको प्यार से 'अभिज्ञान शांकुतल' बोलते थे। बोलेंगे ही...लॉलीपॉप बच्चों को दिया जाता है, उनको पता है कि सामने वाला किस टॉफी को पकड़ कर ज़िंदगी भर चूसरा चुगलता, मगन रहेगा। जब आप जैसे पत्रकारों से भरा दृष्य मीडिया- 'राजधर्म निभाएं' जैसे वाक्य को बोलते समय अटल जी के मंतव्य को भाव को और संदेश को न समझ सका और अपने मन की व्याख्या को लेकर कल का थूका आज चाट रहा है तो समझा जा सकता है तुलना और तुनलात्मकता की कितनी समझ इस मीडिया को है।

यह तो एक उदाहरण था, इसी तरह के विश्लेषण कमोबेश हर चैनल पर थे...हिन्दी, अंग्रेज़ी दोनो!

रविवार, 24 अगस्त 2014

किरांति के वास्ते.....

चेहरा बना है लाल, किरांति के वास्ते,
उनका बढ़ा है बाल, किरांति के वास्ते।
दाढ़ी में है ख़िजाब, किरांति के वास्ते,
झोले में है हथियार, किरांति के वास्ते।
गुदड़ी के बने लाल, किरांति के वास्ते,
मुर्गे भी हैं हलाल, किरांति के वास्ते।
उंगली में है सिगार, किरांति के वास्ते,
हाथों में है गिलास, किरांति के वास्ते।
वोटर किया आयात, किरांति के वास्ते,
मइया को मारी लात, किरांति के वास्ते।
अनुदान लिया खाय, किरांति के वास्ते,
खा करके मारी लात, किरांति के वास्ते।
धरना है कारोबार, किरांति के वास्ते,
कुर्सी की है दरकार, किरांति के वास्ते।
कच्छे में रखा रुमाल, किरांति के वास्ते,
गिरगिट सा है जमाल, किरांति के वास्ते।
कारखाने कब्र हो गए, किरांति के वास्ते,
मजदूर दफन हो गए, किरांति के वास्ते।
क्या-क्या करोगे यार, किरांति के वास्ते,
रस्ते किए सब बंद, किरांति के वास्ते।
भेड़िए ने पहनी खाल, किरांति के वास्ते,
कब तक चलेगा स्वांग, किरांति के वास्ते?  - आशु वाणी 

रविवार, 26 मई 2013

पत्नी की आँख, भेड़िये की आँख(वाईफ आई, वुल्फ आई), लेखक - बेंजामिन रोसेनबाउम

मेरा पहला और अंतिम साहित्य अनुवाद....

लड़ाई नदी के उस पार और जंगल से बाहर की ओर मुड गयी.गौरैयों की लड़ाई पेड़ और फर के बीच की तंग जगहों से निकल कर सिकु़डती सी बाहर आ गयी. एक सर्द बादल, एक भेड़िये की लम्बी आह, भोर में पक कर फूटने को तैयार जगमगाती ओस की बूँदें, वे फूट कर धुंध में मिल रही हैं.

घड़ी समय के साथ चलती जा रही है, दादी माँ रजाई में लिपटी सो रही है, उन दीवारों के बीच, जो नीचे गिराई नहीं जा सकती, सिमटी हुई हवा में गहरी साँसे भर रही है. उसकी इस यात्रा के रास्ते में कोई भी सीमेंट, चौखट, ईंट या पत्थर,हिरन या गौरैया नहीं आ रहे थे. और तो और भेड़िया भी वहां नहीं आ रहा था.


इस बात की संभावना नहीं है कि आत्मीयता भरी हरी आंखें, जिनका एक अपना कमरा है, जिसमें एक आराम कुर्सी है, मिट्टी की गुड़िया है, और भट्ठी पर रक्खी एक थाली है वहां एक भेड़िया आये और वार्निश की हुई मेज के अंत में टंगे काक-भगौड़े को सूंघे. उनके धूसर कोट पर पडी बर्फ की कोई भी सिलवट पिघले और बूँद बन कर झालरदार कालीन पर गिर पड़े - ऐसा नहीं हो सकता.


वहाँ कोई भेड़िया नहीं है. यह तो उसकी पोती है जो कि एक लाल कनटोप, पहन कर आती है. वो चाहती है कि वो चली जाए और उसे छोड़ दे, वो उसे कतई पसंद नहीं करती है, ये एक अजीब सा संदेहास्पद इंसानी व्यवहार है. रिटालिन की प्रतिक्रिया के चलते, जैसे एक झूठ हो, कोई भेड़िया नहीं है.


आवाजें जो घर के सामने एक मोटर के पार्किंग के स्थान पर उसके रुकने से पैदा होती हैं, और फिर कार के दरवाजे के बंद होने की आवाज़.


तीखे ठण्ड के मौसम में नंगे हो रहे रहे जंगल के बीच दादी के घर ने अपनी पहचान को बनाए रखा था. रोशनदान, छत का कोना, धुंधलाया शीशा, खंभे और शहतीर, सत्रह घड़ियों (एक अज्ञात चीड के पेड़ की हाथों से बनी है, एक जापानी देवदार की बनी हाथ से बनी, एक हाथ के बने नर्म लोहे से बनी,एक बैटरी चालित अलार्म घड़ी चेरी की लकड़ी की मेज के ऊपर और मेहमानों के कमरे के बिस्तर के बगल में है, इसकी सुई काले प्लास्टिक की हैं), समाचार पत्र और आग के लिए लकड़ी, फायरप्लेस के साथ ढेर बने रखे हैं.दूर देखने वाले चश्मे में चेन लगी है, मुख्य दरवाजे पर बूट रखे हैं(इनमे से एक जोड़ा पुरुषों के बूट का है, जो ऐसा लगता है कि विषयासक्त शताब्दी से पहले की सदी से खाली रखे हुए है भले ही ये पक्के तौर पर वही सदी थी जो घाव बन गयी, जो भेड़िये की विलक्ष्णता के अलावा सब कुछ बदल गयी), सिलाई का डिब्बा जिसमें सभी आकार के ढेरों बटन थे, कद्दूकस, अंडा काटने वाला, आलू मसलने वाला, खाना पकाने के बर्तन से भरीं दो दराजें(अल्मूनियम या स्टील के), लोहे की देगची, शीशे का जार जिस पर नीले बीड, खिड़की से आ रही रोशनी से दमक रहे थे, पूरा वातानुकूलित, 53 सालों के टैक्स के कागज करीने से बक्से में करके तहखाने में रखे हुए, झाड़ू झाड़न और एक वैक्यूम क्लीनर 22 कैलीबर का हथियार जो तहखाने की सीढियों के नीचे की अल्मारी में रखा है जहाँ दादी माँ अब कभी नहीं पहुंच सकती है. ये सारी चीज़ें मिलकर एक व्यवस्था बन जाती हैं, और उनके सामने जंगली भेड़ियों से भरे जंगल दूर तक पीछा करते हैं.


जब बूढा जीवित था, घड़ी की टिक टिक,शांत और सुरक्षित घर उसे तृप्त रखते थे, और बर्फ की चादर से ढकी दुनिया, जो चौड़ी हो रही दाढ से निकल रही कूकने जैसी आवा़ज़ करती थी, उसे संतुष्ट रखती थी. उसके गर्म हाथ में अपना हाथ रख कर, खिड़की के वितान से बर्फ के तूफान को सफेद तकिये बनाते देखते रहना. दादी माँ के लिए, बर्फ के ढेर से अटी पड़ी जमीन में शाहबतूत के बीज ढूंढने की कोशिश करना, सदाबहार की तीखी पत्ती से घायल होना, और शीतदंश से पीड़ित होना, सब सही था. घर जंगल में इकदम शांतिपूर्ण था, और उसके हाथ अपने दस्ताने में शांत, और खतरे में भी थे ये एक सुरक्षित जगह थी.
बूढे की मौत के बाद, करीब आधी सदी से असुरक्षा सब कुछ खाली किये जा रही थी. पहले की स्थिति मे वापस जा पाना उसके लिये अब संभव नहीं था. दादी भेड़ियों को याद करती थी.


पीछे का दरवाजा थरथरा के खुला, और पोती ने बाहों के बोझ को उतारना शुरु किया. युवा आवाज में एक गीत उभरा.
"भगवान उस बच्चे को आशीर्वाद दे जिसका अपना... ~"


उसकी पुरानी आवाज अब कफ़ से भरी हो गयी है, और दादी माँ बिस्तर पर अपने बदन को एक बेहद गर्म कंबल में लपेटे हुए सिर्फ धुआं उलीचती रहती है. वो बूढे को देखने के लिये अपनी गर्दन घुमाती है, लेकिन कह नही सकती कि वो वहां था.


मौत और हार के बाद भेड़ियों को भगाना बंद हो गया, और मरदाना पोती ने फर्नीचर बाहर कर दिया, गृहयुद्ध से अवकाश प्राप्ति के फ्रेम किये कागजात, 80 साल पुरानी क्रिस्टल की मिठाई की ट्रे और तीन मस्तूलों वाली क्लिपर नौका का लिथोचित्र, साथ ही बेरहमी से बड़े पैमाने पर बनी स्कैंडिनेवियाई गद्देदार कुर्सी जिसके हत्थे को एक एल आकार के पाने में बदल दिया गया था, सबको एक घरेलू सेल लगाकर बेच डाला, और सुई वाली घड़ी को डिजिटल घड़ी से बदल डाला. अभिभावक की गैरहाजिरी में, उसकी रखवाली करने के लिए कोई मतलब नहीं है. भेड़ियों से भरा जंगल दादी माँ के गुजरने के पहले ही विलुप्त हो जाएगा.


पोती, पहले से ही (यह कल ही समझाया गया था) वाई-फाई जैसा कुछ लगा रही थी. वो अदृष्य ज़बान हर जगह पहुंचती है, दीवारों से परे, इलेक्ट्रोमैग्नेटिस्म से सबकुछ चाटती है- सब्जियों से पानी, घड़ी का भीतरी हिस्सा, और दादी माँ की बूढी हड्डियां तक चाट जाती है. ये चाटना इस लिये चाटा जाता है ताकि ये सुनिश्चित हो सके कि वे दुनिया भर में फैली गपशप का हिस्सा है या नहीं. वाई-फाई, लाई-फ़ाई, जंगली आग, उड़ती-आँख और अन्य अपनी तपस्या का भुगतान करने के लिये जूझते रहते हैं.


जब दादी माँ के बाबा ने उनके लिये ये घर बनाया, उनकी दाढी सफेद हो गयी थी, और जब जंगल को छिन्न भिन्न करने के लिये विदेशी प्रेम अड़ियल हो गया, जब उस व्यक्ति ने जवान पेड़ और घने ओक के पेड़ को एक ही तरह से काट कर गिरा दिया, वो भी घड़ी ले आए. घड़ी में समय बीतता गया, और वह लकड़ी काटता गया. पाखंड के झाड़-झंखाड़ से पिछले घावों को इकट्ठा करते हुए कुल्हाड़ी और घड़ी, टिक-टॉक और खटाक-खटाक चलती रही, घाव की जगह पर भट्ठी जलती रही और कालीन से ढंकी, बंद पड़ी दुनिया के हर खूंट को रगड़ती रही. भेड़िया चारों ओर जा-जा कर बर्फ सूंघता रहा, और गौरैया की हड्डियों और उसके नीचे एक इंडियन की हड्डियों को ढूंढ निकालता है. जिस शांति और निश्चिंतता को उनके बाबा ने खोजा था वो वहां शुरु से नहीं थी, बल्कि वो इंसान की बनाई हुई थी, एक नरसंहार और छूत की बीमारी के बाद दबा दी गयी तीखी खामोशी. गर्मी की हरियाली, पंछियों की चूं-चूं, पुराने पेड़ों के गिरने की आवाज़ के कोलाहल में, गर्मी के बहते पानी में आगे जाता, भेड़िये का इंतज़ार करता, मशरूमों की खरपतवार जो छाया बन गयी थी.फिर भी, उस छोटी सी दुनिया के सन्नाटे में वो सदा ही ऐसी थी.


लेकिन अब - इस चिंतातुर, लाल हुई, पोती को अब समय का एहसास हुआ. वाई-फाई, और पत्नी की आँख, सितारों का व्यास जानती है, युवा सितारों की वंशावली, यहाँ तक कि वह कारण भी जिसकी वजह से यहूदी खतना कराते हैं. और उपग्रह, उपग्रह को रात में निर्जन धरातल पर छोड़ कर, कामुक आँखों से हर चीज़ को देखती है. जंगलराज खत्म हो गया है. पत्नी की आँख हर चीज़ को पैकेटों में तराश देती है...या शायद पॉकेटों में (या जानने का कोई तरीका नहीं है कि पोती ने क्या कहा था). घड़ी मूर्खता का एक आभूषण मात्र है, जो टिक-टॉक की आवाज़ करती है, और भेड़िया केवल उसका साथ देता चल सकता है.


माइक्रोवेव बजता है, और लगता है पोती खाने के लिए कुछ पका रही है, शायद सूप. दादी को तब बहुत अच्छा लगता था जब पोती नन्ही थी और लगभग हर चीज़ से विस्मित हो जाती थी. जब वह मैदान से फूल उठाती थी, और मर्द के घुटनों पर सो जाया करती थी, डरावने सपनों के कारण रोते हुए उठ जाया करती थी कि भेड़िया डरावना लग रहा था.
एक अच्छी दादी माँ, पोती को आज के रूप में को पसंद करती. हालांकि, वह एक अच्छी दादी माँ नहीं है. उसका जंगली पत्नी होना भेदिये के स्वभाव का हिस्सा था.एक बेकार पड़े, बूढ़े हो रहे शरीर के बिस्तर के पास से देखते हुए. ये विश्वसनीय कॉलेज जाने वाली लडकी अपना सूप पका रही है.


ट्रे(आइवी लता के पैटर्न के साथ तांबे की बनी) के ऊपर चम्मच बजती है- वो जल्दी से पहुचती है. अभी जहां जिस जगल कोई भी घड़ी नहीं है, वह अजेय है. वह एक पत्नी जैसी नजर डालती है, और उनमें लाली भर लाती है. उस औरत को खुश रखने के लिये कोई भट्ठी नहीं, अल्मारी नहीं, बोर्ड नहीं, आग को कुरेदने वाली छड़ी नहीं, मिट्टी के बर्तन नहीं, मोम नहीं, लोहा नही, सन नहीं, मांस नहीं, क्रीम नहीं, लिंकन डगलस की बहस नहीं. वो चीज़े जो उसे चीजें खुश करतीं हैं वो मोनोसोडियम ग्लूटामेट(भोजन का स्वाद बढाने वाला) और कृत्रिम स्वीट्नर ऐस्पार्टेम, ग्राहकों का समर्थन, रियलिटी टीवी, टेट्रा पैक, डेटाबेस, गैलियम, कृत्रिम स्वीट्नर स्प्लेंडा और कम्प्यूटर से पैदा की गयी तस्वीरें हैं.


समय, जैसा कि हाल के दिनों में ही चलता रहा, ख़ुशी-खुशी चलता जाता है. न दरवाजा खुलने की कोई आवाज़ है, न फर्श पर कदमों की आवाज़ है. केवल पोती का चिकना चेहरा चाँद की तरह आता है, और चम्मच स्टील हो जाती है और कंपन एक बिजली की कौंध जैसा जो बेहद नज़दीक होकर भी अनदेखा जैसा है, जो गाय के पुट्ठे के मीट और लहसुन तथा आलू की महक ढूंढता है.


अगर खरपतवार के साथ जंगल भी बहुत बढ गया होता और पत्नी निगाहों से दूर हो गयी होती, भेड़िया सामने के दरवाजे या घड़ी के आरपार बाहर चला गया होता, सूप देने वाली सजातीय पर अपनी दाढ के साथ कूद पड़ता और उसकी रीढ को एक ही बार में दांतों से कूंच डालता, टैटू की हुई उसकी खाल को फाड़ डालता, और कंबल को खून से भिगो डालता.


दादी माँ चम्मच को पकड़ने के लिये कांपते हुए, अपने होंठ एक बंदर की तरह लटकाती है. कांपते हुए इसे पकड़ती है, सूप की गर्मी और चटपटापन उसके गले के नीचे उतरता है और एक बूंद उसकी ठोढी पर से फिसल पड़ती है.


धूमिल आँखो से, वो अपनी पोती को मुस्काते हुए देखती हैं. और उसकी आवाज़ में गर्मी है. "दादी माँ- आप की आंखें कितनी बड़ी है?"



मूल लेखक- (बेंजामिन रोसेनबाउम)     http://en.wikipedia.org/wiki/Benjamin_Rosenbaum